Madhushala is an epic work of late Shri. Harivansh Rai Bachchan. Consisiting of 135 rubaai (verses of four lines) and 4 were added later, the poet tries to explain the complexity of life in a highly metaphorical way. When first published, it met criticism from many people for its apparent praise of alcohol, but later when the hidden meaning of the verses were understood, it was an instant hit. Below are the few rubaaiaa which are my favorites. Enjoy...धरà¥à¤®à¤—à¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ सब जला चà¥à¤•ी है, जिसके अंतर की जà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¾,मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चà¥à¤•ा जो मतवाला,पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चà¥à¤•ा,कर सकती है आज उसी का सà¥à¤µà¤¾à¤—त मेरी मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤à¤• बरस में, à¤à¤• बार ही जगती होली की जà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¾,à¤à¤• बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤µà¤¾à¤²à¥‹à¤‚, किनà¥à¤¤à¥, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤¸à¥‚रà¥à¤¯ बने मधॠका विकà¥à¤°à¥‡à¤¤à¤¾, सिंधॠबने घट, जल, हाला,बादल बन-बन आठसाकी, à¤à¥‚मि बने मधॠका पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,à¤à¤¡à¤¼à¥€ लगाकर बरसे मदिरा रिमà¤à¤¿à¤®, रिमà¤à¤¿à¤®, रिमà¤à¤¿à¤® कर,बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊà¤, वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠहो मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤¦à¥à¤¤à¤•ारा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ ने मà¥à¤à¤•ो कहकर है पीनेवाला,ठà¥à¤•राया ठाकà¥à¤°à¤¦à¥à¤µà¤¾à¤°à¥‡ ने देख हथेली पर पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,कहाठठिकाना मिलता जग में à¤à¤²à¤¾ अà¤à¤¾à¤—े काफिर को?शरणसà¥à¤¥à¤² बनकर न मà¥à¤à¥‡ यदि अपना लेती मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤®à¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ औ' हिनà¥à¤¦à¥‚ है दो, à¤à¤•, मगर, उनका पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,à¤à¤•, मगर, उनका मदिरालय, à¤à¤•, मगर, उनकी हाला,दोनों रहते à¤à¤• न जब तक मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ मनà¥à¤¦à¤¿à¤° में जाते,बैर बढ़ाते मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ मनà¥à¤¦à¤¿à¤° मेल कराती मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾!छोटे-से जीवन में कितना पà¥à¤¯à¤¾à¤° करà¥à¤, पी लूठहाला,आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',सà¥à¤µà¤¾à¤—त के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,बंद लगी होने खà¥à¤²à¤¤à¥‡ ही मेरी जीवन-मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤®à¥‡à¤°à¥‡ अधरों पर हो अंतिम वसà¥à¤¤à¥ न तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤² पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾à¤®à¥‡à¤°à¥€ जीवà¥à¤¹à¤¾ पर हो अंतिम वसà¥à¤¤à¥ न गंगाजल हाला,मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखनाराम नाम है सतà¥à¤¯ न कहना, कहना सचà¥à¤šà¥€ मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤®à¥‡à¤°à¥‡ शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हालाआह à¤à¤°à¥‡ वो, जो हो सà¥à¤°à¤¿à¤à¤¤ मदिरा पी कर मतवाला,दे मà¥à¤à¤•ो वो कानà¥à¤§à¤¾ जिनके पग मद डगमग होते होंऔर जलूं उस ठौर जहां पर कà¤à¥€ रही हो मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤”र चिता पर जाये उंढेला पतà¥à¤° न घà¥à¤°à¤¿à¤¤ का, पर पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾à¤•ंठबंधे अंगूर लता में मधà¥à¤¯ न जल हो, पर हाला,पà¥à¤°à¤¾à¤£ पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‡ यदि शà¥à¤°à¤¾à¤§ करो तà¥à¤® मेरा तो à¤à¤¸à¥‡ करनापीने वालों को बà¥à¤²à¤µà¤¾ कऱ खà¥à¤²à¤µà¤¾ देना मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤¨à¤¾à¤® अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवालाकाम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,जाति पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‡, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों कीधरà¥à¤® बताना पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¥‹à¤‚ की ले माला जपना मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤¶à¤¾à¤‚त सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की जà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¾,'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,कितनी इचà¥à¤›à¤¾à¤à¤ हर जानेवाला छोड़ यहाठजाता!कितने अरमानों की बनकर कबà¥à¤° खड़ी है मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤•ितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,टूट चà¥à¤•ी अब तक कितने ही मादक पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¥‹à¤‚ की माला,कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गà¤,कितने पीनेवाले आà¤, किनà¥à¤¤à¥ वही है मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤®à¥ˆà¤‚ मदिरालय के अंदर हूà¤, मेरे हाथों में पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¥‡ में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,इस उधेड़-बà¥à¤¨ में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -मैं मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾ के अंदर या मेरे अंदर मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾!जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,जितनी उर की à¤à¤¾à¤µà¥à¤•ता हो उतना सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° साकी है,जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤à¤•à¥à¤šà¤² हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾!पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हà¥à¤ˆ यह मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾!सà¥à¤µà¤¯à¤‚ नहीं पीता, औरों को, किनà¥à¤¤à¥ पिला देता हाला,सà¥à¤µà¤¯à¤‚ नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता पà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¾,पर उपदेश कà¥à¤¶à¤² बहà¥à¤¤à¥‡à¤°à¥‹à¤‚ से मैंने यह सीखा है,सà¥à¤µà¤¯à¤‚ नहीं जाता, औरों को पहà¥à¤‚चा देता मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾à¥¤- हरिवंश राय बचà¥à¤šà¤¨