नाज़ तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ था बेटे पर,बोठलगी थीं बेटियां।बेटों की सब मांगें पूरीं,तरस रही थीं बेटियां।पर तकदीर ने पलà¥à¤Ÿà¤¾ खाया,बोठके वरà¥à¤— में तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ बिठाया।बेटों को तà¥à¤® बोठलगे,ढोने से कतराने लगे,तब पलकों पर तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ बिठाने,तैयार खडी थीं बेटियां। नाज़ तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ था बेटों पर,बोठलगीं थीं बेटियां.......(आज अपनी यह छोटी सी रचना पà¥à¤¨: पà¥à¤°à¤•ाशित करने की इचà¥à¤›à¤¾ हà¥à¤ˆà¥¤ इचà¥à¤›à¤¾ इसलिठà¤à¥€ हà¥à¤ˆ की जब मैंने यह कविता बà¥à¤²à¥‰à¤— पर पोसà¥à¤Ÿ की थी तब आप सब मेरे साथ नहीं थे, लेकिन अब आप सब साथ हैं तो सोचा इसे आप तक पहà¥à¤à¤šà¤¾ ही दूà¤à¥¤ इसे आप टिपà¥à¤ªà¤£à¥€ पाने का मोह à¤à¥€ कह सकते हैं....)